Thursday, 2 April 2015

क्या फ़ोन कॉल रेट बेहद महंगे हो जाएँगे?

भारत, टेलीकॉम सेक्टर, मोबाइल फोन
स्पेक्ट्रम की नीलामी में एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई भारत के सरकारी खज़ाने के लिए एक अहम घटना थी.
लेकिन मोबाइल सेवा मुहैया कराने वाली कंपनियों को इसके लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है. इसका परिणाम ये हो सकता है कि कॉल दरें ख़ासी बढ़ सकती हैं.
इससे भी बुरी ख़बर ये है कि इस नीलामी से भारत के टेलीकॉम सेक्टर की समस्याएँ- काल न लगना, बातचीत के बीच में ही लाइन टूटना - सुलझने नहीं जा रही हैं.
आम लोगों के लिए इस पूरे मामले से संबंधित कई अहम सवाल हैं.

स्पेक्ट्रम क्या है, आपको फिक्र क्यों हो?

भारत, टेलीकॉम सेक्टर, मोबाइल फोन
मोबाइल टेलीफोन की सेवा में रेडियो तरंगों का इस्तेमाल किया जाता है. स्पेक्ट्रम को फ्रीक्वेंसीज़ में मापा जाता है, इनका एलॉटमंट ब्लॉक्स में होता है.
प्रत्येक टेलीकॉम ज़ोन मोबाइल वहाँ सेवा मुहैया कराने वाली कंपनियों के लिए टेलीकॉम 'सर्किल' के तौर पर जाना जाता है.
एलॉट की गई एक निर्धारित फ्रीक्वेंसी का मतलब ये होता है कि एक इलाके में एक निश्चित संख्या में उपभोक्ताओं को टेलीकॉम सेवाएं मुहैया कराई जा सकती हैं.
भारत में किसी एक क्षेत्र में उन मोबाइल उपभोक्ताओं की सबसे अधिक संख्या रहती है जो एक ही स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल कर रहे होते हैं.
यही सबसे बड़ी वजह है कि फोन करने की कोशिशें नाकाम हो जाती हैं या फिर अक्सर ही बातचीत बीच में ही कट जाती है.
अधिक स्पेक्ट्रम का मतलब ये भी है कि मोबाइल कॉल की गुणवत्ता सुधर सकती है और इससे तेज रफ्तार से बेहतर डाटा सेवाओं के मिलने की भी संभावना है.

वास्तव में नीलाम क्या हो रहा है?

भारत, टेलीकॉम सेक्टर, मोबाइल फोन
सरकार किसी सर्किल विशेष में फ्रीक्वेंसीज़ के निर्धारित ब्लॉक के इस्तेमाल के लिए लाइसेंस की नीलामी करती है.
स्पेक्ट्रम की मौजूदा नीलामी में 800, 900 और 1800 मीटर हर्ट्ज़ के बैंड्स की फ्रीक्वेंसी शामिल हैं.
टेलीकॉम कंपनियों के 20 साल के लाइसेंस खत्म होने जा रहे हैं और इसीलिए इन फ्रीक्वेंसीज़ की दोबारा से नीलामी की जा रही है.
इनमें 2100 मीटर हर्ट्ज़ बैंड की फ्रीक्वेंसी भी है जिससे नए स्पेक्ट्रम जारी होंगे.

सभी बैंड अलग, 'कीमत' भी अलग?

भारत, टेलीकॉम सेक्टर, मोबाइल फोन
इन फ्रीक्वेंसी बैंड्स की अलग अलग विशेषताएं हैं. कम फ्रीक्वेंसी वाले सिग्नल लंबी दूरी तय कर सकते हैं.
इसक मतलब ये भी हुआ कि कम मोबाइल टावरों को जरूरत होगी.
इसलिए 900 मीटर हर्ट्ज़ का स्पेक्ट्रम जिससे 3जी सेवाएं दी जा सकती हैं, महत्वपूर्ण हो जाता है. जाहिर है इसकी कीमत अधिक होगी और ऊंची बोली लगेगी.
इस फ्रीक्वेंसी बैंड का एलॉटमेंट सबसे पहले किया गया था. यह तब की बात है जब 90 के दशक के मध्य में मोबाइल टेलीफोन सेवाओं की शुरुआत हुई थी.

2015 की नीलामी का असर

भारत, टेलीकॉम सेक्टर, मोबाइल फोन
अगर आपका मोबाइल ऑपरेटर उसी स्पेक्ट्रम को नीलामी में फिर से नहीं जीत पाता है जो 20 साल पहले उसे मिला था, तो कुछ टेलीकॉम सर्किलों में उसका कारोबार बंद हो सकता है.
इसका मतलब ये हुआ कि आपको अपना मोबाइल ऑपरेटर बदलना होगा. नतीजतन प्रतिस्पर्धा में कमी आ सकती है और कॉल दरें महंगी हो सकती हैं.
किसी भी सूरत में नीलामी की ऊंची बोली के कारण मोबाइल फोन की कॉल दरें बढ़ सकती हैं.
हालांकि ये जरूरी नहीं कि टेलीकॉम कंपनियों पर इस नीलामी का असर फौरी तौर पर पड़ने वाला है क्योंकि उन्हें इसकी कीमत चुकाने के लिए वक्त मिलेगा.

कौन सी कंपनियां प्रभावित?

भारत, टेलीकॉम सेक्टर, मोबाइल फोन
जिन स्पेक्ट्रम की फिलहाल नीलामी हो रही है, उनमें ज्यादातर एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया और रिलायंस टेलीकॉम के पास हैं.
इनके लाइसेंस जल्द ही खत्म होने जा रहे हैं. अगर वे अपना स्पेक्ट्रम बरकरार नहीं रख पाए, तो कुछ टेलीकॉम सर्किलों में उनकी सेवाएं बंद हो सकती हैं.
टेलीकॉम बाज़ार में ऊँचे दांव लगे हुए हैं और मोबाइल कंपनियों के पास खोने के लिए बहुत कुछ है. इसलिए नीलामी में ऊँची बोली लग रही है.
वे अपना स्पेक्ट्रम अपने प्रतिस्पर्धी के हाथों गंवा सकते हैं या फिर इस बाजार का कोई नया खिलाड़ी भी उनसे ये स्पेक्ट्रम ले सकता है.
रिलायंस जियो एक कंपनी है जिसके पास पहले से देश भर में 4जी सेवाएं देने के लिए स्पेक्ट्रम है.

उस स्पेक्ट्रम का क्या जिसकी नीलामी नहीं?

भारत, रक्षा विभाग
भारत में उपलब्ध स्पेक्ट्रम का एक बड़ा हिस्सा सुरक्षा के लिए आरक्षित है.
भारत के सशस्त्र बल कई तरह के साजोसामान इस्तेमाल करते हैं और उनमें कई तरह की फ्रीक्वेंसी इस्तेमाल की जाती है.
2100 मीटर हर्ट्ज़ बैंड पहले रक्षा इस्तेमाल के लिए आरक्षित थी लेकिन उसके एक हिस्से को बाज़ार के लिए छोड़ा जा रहा है.

स्पेक्ट्रम की इतना मांग क्यों?

अनिल अंबानी
इसके तीन कारण हैं. पहला ये कि भारत में चीन के बाद दुनिया में दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा मोबाइल फोन धारक हैं.
दूसरा, किसी अन्य देश की तुलना में भारत में किसी टेलीकॉम सर्किल में मोबाइल सेवा मुहैया कराने वाली कंपनियों की संख्या सबसे ज्यादा है.
इसका मतलब हुआ कि एक स्पेक्ट्रम के लिए यहां कहीं ज्यादा प्रतिस्पर्धा है. तीसरा कारण ये है कि कई देशों की तुलना में भारत में कम स्पेक्ट्रम उपलब्ध है.
यहां बड़े पैमाने पर स्पेक्ट्रम रक्षा इस्तेमाल के लिए रिज़र्व रखी गई हैं.

नेटवर्क समस्या सुलझेगी?

भारत, मोबाइल नेटवर्क, टेलीकॉम सेक्टर
ऑपरेटर के अधिक स्पेक्ट्रम खरीदने से भी नेटवर्क समस्या सुलझने के आसार नहीं हैं.
2015 की नीलामी से ज्यादा बदलाव नहीं होने वाले हैं क्योंकि ज्यादातर मौजूदा स्पेक्ट्रम लाइसेंस खत्म होने जा रहे हैं.
दूसरा, अगर कंपनियां इन स्पेक्ट्रम को वापस पाने में नाकाम रहीं, तो कुछ सर्किलों में उनकी सेवाएं बंद हो जाने का खतरा है, इससे मोबाइल सेवाओं की गुणवत्ता में भी गिरावट आएगी.
इसलिए नीलामी की जरूरत सेवाओं को जारी रखने के लिए थी.
2100 मीटर हर्ट्ज़ बैंड के कुछ स्पेक्ट्रम को जारी किए जाने के बाद भीड़ भाड़ वाले नेटवर्क में सेवाओं के सुधार की संभावना जगी है.
लेकिन मोबाइल धारकों की बढ़ती संख्या, ख़ासकर इंटरनेट यूजर की बढ़ती तादाद के कारण मोबाइल सेवाओं की गुणवत्ता में बेहतरी होने की बजाय गिरावट देखी जा सकती है.
2015 में कई मोबाइल पर कॉल करने की कोेशिशें नाकाम होती रहेंगी या फिर बातचीत की लाइन बीच में टूटती रहेगी.

क्या कॉल दर बेहद महंगी होंगी?

भारत, मोबाइल नेटवर्क, टेलीकॉम सेक्टर
ऐसे वक्त में जब स्पेक्ट्रम नीलामी में कंपनियों को एक लाख करोड़ रुपए की चपत लग रही है तो मोबाइल कॉल रेट महंगा हो सकता है.
इससे मोबाइल फोन पर एक ग्राहक की तरफ से खर्च की जाने वाली औसत रकम के बढ़ने की संभावना है. भारत में फिलहाल यह राशि दुनिया में सबसे कम 120 रुपये है.
तस्वीर का दूसरा पहलू ये भी है कि मोबाइल के इस्तेमाल में कमी आ सकती है और ग्राहक अपने खर्च में कटौती कर सकते हैं.
ऊँची प्रतिस्पर्धा के कारण शुरुआत में कंपनियां कॉल रेट बढ़ाने से बचेंगी. लेकिन इससे उनके मुनाफे पर असर पड़ेगा.
इसका एक नतीजा ये भी हो सकता है कि वे अधिक मुनाफे वाले सर्किल और उपभोक्ताओं की तरफ रुख करें. इसका नुकसान ग्रामीण इलाकों और कम मुनाफे वाले क्षेत्रों को उठाना पड़ सकता है.
हालांकि ऐसा भी नहीं है कि ऐसे हालात तुरंत पैदा होंगे क्योंकि लाइसेंस फीस चुकाने के लिए कंपनियों के पास काफी वक्त है.

'2जी स्पेक्ट्रम घोटाला' क्या है?

पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा
पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा
साल 2008 में 122 2जी लाइसेंस 2001 की कीमतों पर बिना किसी नीलामी के पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर बेचे गए थे.
सीबीआई का आरोप था कि कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए रिश्वत दी गई.
सीएजी के अनुसार अगर इन स्पेक्ट्रम को नीलाम किया गया होता तो 2010 की स्पेक्ट्रम कीमतों के आधार पर 2008 की नीलामी में 1,76,000 करोड़ रुपये सरकारी खजाने में जमा हुए होते.
इस 'घोटाले' के कारण सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में 122 लाइसेंस रद्द कर दिए. ये वही स्पेक्ट्रम थे जो 2008 में एलॉट किए गए थे.
उस वक्त के दूरसंचार मंत्री ए राजा को '2जी घोटाले' में अपनी भूमिका के लिए 15 महीने तिहाड़ जेल में बिताने पड़े

स्पेक्ट्रम बेचने का फ़ायदा किसे?

स्मार्टफ़ोन
भारत सरकार ने मार्च, 2015 में दूरसंचार क्षेत्र में 2जी और 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी करने का फ़ैसला लिया है जिसके सरकार को दो वर्ष के भीतर एक लाख करोड़ रुपए की आमदनी होने की उम्मीद है.
ख़ास बात ये है कि जिस दूरसंचार स्पेक्ट्रम की नीलामी होनी है उनमें से अधिकतर बड़ी मोबाईल कंपनियों के पास हैं जिनकी लीज़ अब ख़त्म हो रही है.
नवंबर, 2015 के पहले इन मोबाईल कंपनियों को अपने-अपने क्षेत्रों में स्पेक्ट्रम दोबारा खरीदना ही पड़ेगा.
इस बात को ध्यान में रखते हुए मोबाईल कंपनियां अपने क्षेत्रों में मौजूदगी बनाए रखने के लिए भारी बोली भी लगा सकती हैं.

दाम

मोबाईल का इस्तेमाल करती भारतीय
नरेंद्र मोदी सरकार ने नीलामी के लिए 3,705 करोड़ रुपए प्रति मेगाहर्टज के आधार मूल्य को मंजूरी दी है.
सरकार की निगाह सभी बैंड में स्पेक्ट्रम की बिक्री से एक लाख करोड़ रुपए जुटाने पर है जिसमें अकेले 3जी स्पेक्ट्रम की बिक्री से सरकार को 17,000 करोड़ मिल सकते हैं.
लेकिन सवाल ये उठता है कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में हुई कथित अनियमितताओं की ओर संकेत करने वाली नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट के आंकड़ों का क्या होगा.
संसद में पेश हुई उस रिपोर्ट में कहा गया था कि 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में दूरसंचार मंत्रालय की नीतियों के कारण देश को 1.76 लाख करोड़ का अनुमानित नुकसान हुआ था.

भरपाई?

जयंतो रॉय चौधरी, बिजनेस संपादक,टेलिग्राफ़
सवाल ये भी उठते रहते हैं कि क्या सरकार इस अनुमानित नुक्सान की कभी भरपाई भी कर सकेगी?
टेलीग्राफ़ अख़बार के बिज़नेस संपादक जयंतो रॉय चौधरी के अनुसार,"स्पेक्ट्रम दोबारा बेचने पर भरपाई तो हो सकती है. लेकिन सीएजी रिपोर्ट के आंकड़े कुछ तथ्यों को ध्यान में रख कर एक अनुमान लगाने के बाद निकले थे, जो कल्पना पर भी आधारित थे".
उन्होंने कहा, "क्योंकि वो एक अनुमानित नुकसान था इसलिए ये कह पाना मुश्किल है कि अगर दूसरे तरीके से स्पेक्ट्रम की नीलामी होती तो उतनी ही कमाई होती या नहीं. लेकिन जो नीलामी होने जा रही है उसमे सरकार को जो पैसा मिलेगा वो अच्छा होगा".

मामला

प्रशांत सिंघल, अन्सर्ट एंड यंग के वरिष्ठ विश्लेषक
2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में कथित घोटाले की शुरुआत वर्ष 2008 में हुई थी जब ए राजा के नेतृत्व वाले दूरसंचार मंत्रालय ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में 'पहले आओ पहले पाओ' की नीति अपनाकर कुछ कथित अयोग्य कंपनियों को स्पेक्ट्रम दे दिया था.
उस नीलामी पर ऐसे भी आरोप लगे थे कि साल 2008 में स्पेक्ट्रम बेचते समय जो दाम रखा गया वो दरअसल साल 2001 का दाम था.
यूनिटेक और स्वान टेलीकॉम जैसी कंपनियों पर इस सस्ती स्पेक्ट्रम को खरीद कर इन्हें मनमानी कीमत पर बेचने के भी आरोप लगे और ए राजा समेत कई नामचीन हस्तियां और उद्योगपति इन आरोपों के चलते जेल में भी रहे.
मामला अब सर्वोच्च न्यायालय में हैं जिसने उन सभी आवंटनों को रद्द कर दिया था और अदालती कार्रवाई जारी है.
हालांकि कुछ जानकारों का मत है कि भारत और ख़ासतौर से दूरसंचार क्षेत्र अब उस कथित घोटाले से ऊपर उठ चुका है.
अर्न्स्ट एंड यंग के वरिष्ठ विश्लेषक प्रशांत मानते हैं कि आवंटन रद्द होने से कुछ कंपनियों ने पैसा खोया और कई लोगों ने नौकरियां गंवाई.

मुनाफ़ा

स्मार्टफ़ोन
विश्लेषक प्रशांत कहते हैं, "उसके बाद से तीन नीलामियां हो चुकी हैं और उनमें से दो बेहद सफल रहीं. जहां तक अनुमानित नुकसान की बात है तो सरकार नुकसान से ज़्यादा पैसे कमाएगी अगर हम पिछले तीन वर्ष की और आगामी नीलामी के आंकड़ों पर गौर करें तो. सरकार ने आगामी नीलामी के लिए पहले से ही स्पेक्ट्रम का दाम तय कर दिया है तो संभव है कम खरीददार आएं पर बिक सब कुछ जाएगा".
गौर करने वाली बात ये भी है कि भारत में जितनी भी स्पेक्ट्रम नीलाम होने जा रही हैं उसमें से ज़्यादातर पहले से ही कंपनियों के पास है.
कुछ देशों में ऐसा भी होता है कि जिन कंपनियों के पास स्पेक्ट्रम होता है वे ही बाज़ार के दाम में उसे दोबारा खरीद लेते हैं और नीलामी की प्रक्रिया नहीं होती.
जयंतो रॉय चौधरी ने बताया, "भारत में टेलीकॉम कंपनियां यही चाहती थीं, जिससे वे अपने-अपने सर्किल में बनी रहें. लेकिन अब न चाहते हुए भी उन्हें नीलामी की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ेगा और ज़्यादा बोली लगाने वाले को ही स्पेक्ट्रम मिल सकेगा. ये इसलिए भी किया गया हो सकता है क्योंकि नई सरकार पिछले कथित टेलीकॉम घोटाले जैसा कुछ भी नहीं चाहेगी."
सरकार को स्पेक्ट्रम की बिक्री से कुल आमदनी कितनी होगी ये तो मार्च में पता चलेगा लेकिन मुनाफ़ा ज़बरदस्त होगा ये लगभग तय है.

हलो, हलो, फ़ोन फिर कटा, धत् तेरे की!

क्या आप भी अपने फ़ोन पर बात काम और हलो-हलो ज़्यादा करते हैं. कॉल ड्रॉप होना भारत की एक राष्ट्रीय समस्या बन गया है.
फ़ोन ऑपरेटरों के अनुसार भारत में मोबाइल सर्विस क्वालिटी का मूल कारण है ढांचागत कमज़ोरियाँ. भारत में ना पर्याप्त मोबाइल टावर हैं ना पर्याप्त स्पेक्ट्रम.

पूरी ख़बर विस्तार से

नवंबर के अंत में जब क्लेयर बरहागन दिल्ली पहुंची और अपने मोबाइल फ़ोन को ऑन किया तो उनका पहली बार भारत से सामना हुआ.
वो कहती हैं,'' मैं 15 मिनट तक हर नेटवर्क से जुड़ने का प्रयास करती रही. अंत में मैं एयरटेल के नेटवर्क से जुड़ी. लेकिन मैं फ़ोन नहीं कर सकती थी. मेजबान को फ़ोन करने के लिए मैंने एक सहयात्री से मोबाइल मांगा.''
किसी तरह वो अपने होटल पहुंची और बेल्ज़ियम में अपने पति को फ़ोन किया. इस दौरान दो बार उनकी कॉल ड्राप (बात करते हुए बीच में फ़ोन का कट जाना.) हुई.

मोबाइल फ़ोन

भारत में मोबाइल फ़ोन की शुरूआत 1990 के मध्य में हुई थी. उस समय कॉल की गुणवत्ता बेहतर थी. मोबाइल फ़ोन सेवा लैंडलाइन से भी बेहतर थी. उस समय कॉल ड्राप की शिकायत बहुत कम होती थी. मोबाइल फ़ोन के उपभोक्ताओं की संख्या बहुत कम थी. हालांकि दरें बहुत अधिक थीं, 16 रुपए प्रति मिनट तक.
वहीं आज जब काल दरें 20 गुना तक सस्ती हैं. देश में क़रीब 92 करोड़ मोबाइल फ़ोन उपभोक्ता हैं. हर सेकेंड एक भारतीय एक हैंडसेट खरीद रहा है. ऐसे में ऐसा क्या है जिनका उन्हें रोज़-रोज़ सामना करना पड़ता है.

5 समस्याएं

संपर्क नहीं हो सकता : जब आप रोमिंग पर हों तो किसी को फ़ोन करना कठिन हो सकता है. अगर आप हवाई जहाज से अभी-अभी उतरें हैं तो, उस समय सैकड़ों मोबाइल फ़ोन ऑन होते हैं और किसी ओवरलोडेड नेटवर्क पर किसी को कॉल कर रहे होते हैं. ट्रेन में यात्रा के दौरान बात करने में दिक्कत होती है. यही हाल तब भी होता है जब आप किसी राजमार्ग से गुजर रहे होते हैं.
नेटवर्क बिज़ी : आपके हैंडसेट में सिग्नल पूरा है. लेकिन कॉल नहीं कर सकते. दिल्ली हवाई अड्डा हो या गुड़गांव साइबर सिटी या देश का कोई बड़ा शहर, हर जगह यह समस्या आम बात है. कई उपभोक्ता अपने फ़ोन को ऑटो रीडॉयल मोड में रखते हैं. यह समस्या को और बढ़ाती है.
कॉल ड्राप : जब आप या आप जिसे कॉल रहे हैं वो अगर चल रहे हैं, तो कॉल ड्राप की समस्या आम बात है. ऐसे में दोनों लोग रीडायल कर रहे होते हैं और संपर्क नहीं हो पाता है. अगर इनमें से कोई एक किसी ओवरलोडेड नेटवर्क एरिया में जाता है, तो आप आसानी से संपर्क नहीं कर पाएंगे.
इंटरनेट नहीं : भारत में मोबाइल डाटा का आंकड़ा गड़बड़ है. 3जी की सुविधा हर जगह नहीं है. जहां आपको 3जी का भरपूर सिग्नल मिल रहा हो, हो सकता है कि वहां आपको फ़ोन करने की सुविधा न मिले. यह उस देश का हाल है, जहां मोबाइल पर 24 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं, जो इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं का 92 फ़ीसद है.
ख़राब सिग्नल : मोबाइल फ़ोन के कमज़ोर सिग्नल बड़ी ऊंची इमारतों में बने दफ़्तरों और घरों में आम बात है.

क्यों है समस्या?

अब सवाल यह है कि आधुनिक भारत में मोबाइल नेटवर्क की यह हालत क्यों है.
मोबाइल सेवा देने वाली कंपनी एयरटेल की योजना और रणनीति मामलों के प्रमुख श्याम मार्दिकर कहते हैं, '' इसकी तीन प्रमुख वजहें हैं, स्पेक्ट्रम, स्पेक्ट्रम और स्पेक्ट्रम.''
सभी वायरलेस संचार के सिग्नल को ले जाने वाली रेडियो तरंगों को स्पेक्ट्रम कहा जाता है. दुनिया भर में स्पेक्ट्रम पर सरकारी नियंत्रण है.
भारत में मोबाइल फ़ोन के लिए स्पेक्ट्रम बहुत कम है. जो है वो दर्जनों ऑपरेटरों में बंटा है. अधिकतर स्पेक्ट्रम रक्षा सेवाओं के लिए है.
दिल्ली के बड़े ऑपरेटर के पास उतने ही 3जी के उपभोक्ता हैं, जितने सिंगापुर और शंघाई के ऑपरेटर के पास हैं. लेकिन उनके पास उनके स्पेक्ट्रम का दसवां हिस्सा ही है.

डिजिटल इंडिया को ख़तरा

दुनिया के जीएसएम ऑपरेटरों के एसोसिएशन के प्रमुख ने नवंबर में संचार मंत्री को लिखी एक खुली चिट्ठी में कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया के विचार को स्पेक्ट्रम संकट से ख़तरा है.
भारत में अभी क़रीब चार लाख 25 हज़ार मोबाइल फ़ोन टॉवर हैं. लेकिन दी टॉवर एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स एसोसिएशन का कहना है कि करीब दो लाख और टॉवर चाहिए.
मोबाइल फ़ोन टॉवर्स से होने वाले रेडियेशन के ख़िलाफ़ धरना-प्रदर्शन हुए हैं. इस वजह से कई टॉवर बंद कर दिए गए. इसका मोबाइल फ़ोन सेवाओं पर प्रभाव पड़ा.
टेलीकॉम विशेषज्ञों का कहना है कि टॉवर्स से रेडियशन को लेकर धारणा गलत है. उनका कहना है कि भारत के मोबाइल फ़ोन टॉवर्स विश्व स्वास्थ्य संगठन के सुरक्षा मानकों को पूरा करते हैं.
भारत में दस में से नौ प्री पेड उपभोक्ता हैं. इनका महीने का खर्च 120 रुपए से भी कम है. यह खर्च दुनिया में सबसे कम है. ऐसे उपभोक्ताओं की उम्मीदें ज्यादा हैं और धीरज कम.
जब वो किसी से संपर्क नहीं कर पाते हैं, तो लगातार री डायल करते रहते हैं. इससे नेटवर्क बिजी हो जाता है.
ऐसे उपभोक्ताओं की संख्या स्पेक्ट्रम से भी तेज़ी से बढ़ेगी. अधिक लोग डाटा का इस्तेमाल करेंगे. इससे नेटवर्क पर दबाव बढ़ेगा. क्या चीजें भी बेहतर होंगी?
इस सवाल पर इस उद्योग के सूत्रों का कहना है, नहीं.

मोबाइल कंपनियों के घड़ियाली आंसू!

भारत में हाल में हुई स्पेक्ट्रम नीलामी के बाद से ही मीडिया में ख़बरें गर्म हैं कि अब मोबाइल कॉल रेट 10 से 15 प्रतिशत तक बढ़ने वाले हैं.
कहा जा रहा है कि मोबाइल स्पेक्ट्रम ख़रीदने के लिए टेलीकॉम कंपनियों ने जो पैसा खर्च किया, उससे उनकी आमदनी को धक्का लगा और वो घाटे में आ गई हैं.
लेकिन दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भरोसा दिलाया कि ऐसा कुछ नहीं होगा.
रविशंकर प्रसाद ने कहा कि उनके आकलन के हिसाब से मोबाइल कंपनियों को अपना राजस्व बराबर करने के लिए कॉल रेट बढ़ाने की ज़रूरत नहीं है.
बीबीसी हिन्दी ने की इन ख़बरों और सरकार के दावों की पड़ताल.

पढ़ें रिपोर्ट विस्तार से

हाल में हुई स्पेक्ट्रम नीलामी से भारत सरकार को एक लाख करोड़ रुपए से ज़्यादा कमाई हुई है.
सेल्युलर ऑपरेटर एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के मुख्य निदेशक राजन मैथ्यूज़ से जब बीबीसी ने पूछा कि स्पेक्ट्रम की ख़रीद का टेलीकॉम कंपनियों पर कितना असर पड़ा है तो उन्होंने स्थिति की गंभीरता के बारे में बताया.
मैथ्यूज़ ने कहा, "स्पेक्ट्रम ख़रीदने के लिए इतना खर्च करने के बाद मोबाइल कंपनियों को कर्ज़ लेकर उसकी भरपाई करनी होगी. अंतरराष्ट्रीय स्पेक्ट्रम खरीद के मापदंड के मुकाबले भारतीय मोबाइल कंपनियां सरकार को स्पेक्ट्रम की ख़रीद के लिए 30 प्रतिशत ज़्यादा पैसा दे रही हैं."
उनके अनुसार, "पिछले कुछ वर्षों से मोबाइल ऑपरेटर कंपनियों ने खुद को कई बार रेट बढ़ाने से रोका है. अब हम और वित्तीय बोझ नहीं उठा सकते."
भारत में करोड़ों मोबाइल उपभोक्ता हैं और उनमें से कई स्मार्टफ़ोन पर इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं. इसलिए आम धारणा ये है कि बढ़ते उपभोक्ताओं को लुभाने के लिए कंपनियों को अपनी सेवाएं सस्ती ही रखनी चाहिए.

मंशा का समर्थन

सेल्युलर ऑपरेटर एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया भारत की सात मोबाइल सेवा कंपनियों का प्रतिनिधित्व करती हैं.
एसोसिएशन का कहना है कि तमाम कंपनियां सरकार की सभी भारतीयों को मोबाइल इंटरनेट सेवा देने की मंशा का समर्थन करती हैं, लेकिन कंपनियों के पास इसे पूरा करने के लिए साधन नहीं हैं.
रविशंकर प्रसाद ने कॉल रेट बढ़ने की ख़बरों पर लगाम लगाते हुए कहा था, "टेलीकॉम रेग्युलेटर के आंकड़ों पर आधारित एक आसान-सा गणित किया जाए तो ये निष्कर्ष निकलता है कि कॉल रेट 1 रुपए 30 पैसे प्रति मिनट से ज़्यादा नहीं बढ़ेंगे."
वहीं टेलीकॉम सचिव राकेश गर्ग ने कहा, "मोबाइल कंपनियों को स्पेक्ट्रम 20 वर्षों के लिए दिया गया है. यानी हर साल उन्हें 5300 करोड़ रुपए देने होंगे. मोबाइल इंडस्ट्री की सालाना आय दो लाख करोड़ है."
गर्ग के अनुसार, "अगर आप कुल मोबाइल मिनट को 5300 करोड़ से भाग करें, तो लगभग एक रुपए 30 पैसे प्रति मिनट की एक कॉल होनी चाहिए."

सरकारी गणित

लेकिन मोबाइल कंपनियाँ सरकार के गणित को सही नहीं मानतीं.
राजन मैथ्यूज़ ने बीबीसी से कहा, "मंत्री जी ने न तो अपने गणित में महंगाई को ध्यान में रखा है और न ही इस बात का उल्लेख किया है कि मोबाइल कंपनियां सरकार को स्पेक्ट्रम के अलावा अपनी कमाई का 13 प्रतिशत लाइसेंस फ़ीस के तौर पर भी देती हैं."
वो कहते हैं, "मोबाइल क्षेत्र दुविधा में है और अगर हमने अपनी सेवाओं का रेट 12 से 15 प्रतिशत ज़्यादा नहीं बढ़ाया तो हम अपना अस्तित्व खो देंगे."
हालांकि टेलीकॉम मामलों के जानकार अाशुतोष सिन्हा सरकार के गणित को बिल्कुल ग़लत नहीं मानते.
बीबीसी से बातचीत में सिन्हा ने कहा कि उन्हें सरकार का गणित पूरी तरह सटीक नहीं लगता, लेकिन मोबाइल कंपनियों के गणित से ज़्यादा वास्तविक लगता है.

स्मार्टफ़ोन से बढ़ा लाभ

मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट
सिन्हा ने बीबीसी से कहा, "मोबाइल कंपनियों ने इस बात का ज़िक्र नहीं किया कि उन्हें बढ़ते स्मार्टफ़ोन उपभोक्ताओं से भी काफ़ी पैसा मिल रहा है. 3 जी इस्तेमाल करने वालों से डाटा ट्रैफ़िक बढ़ रहा है, तो ऐसा नहीं है कि मोबाइल कंपनियां बड़े घाटे में हैं."
सिन्हा के अनुसार, "उपभोक्ता कॉल रेट बढ़ने पर तो शिकायत करते हैं, लेकिन डेटा सेवाओं का जो रेट बढ़ा है, उसकी शिकायत करता कोई नहीं दिखता, क्योंकि लोग ये सेवाएं इस्तेमाल करना चाहते हैं."
उन्होंने कहा, "आजकल बढ़ती तादाद में लोग रोमिंग, मोबाइल बैंकिंग और सोशल नेटवर्किंग सेवाओं के लिए मोबाइल डाटा सेवाओं पर निर्भर हैं, तो ऐसे में मोबाइल कंपनियां को बेवजह शोर नहीं मचाना चाहिए."
स्मार्ट फ़ोन
इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2013 में उपभोक्ताओं का करीब 45 प्रतिशत मोबाइल बिल डेटा सेवाओं पर लगा जबकि वर्ष 2014 में ये आंकड़ा बढ़कर 54 प्रतिशत हो गया था.